Saturday, January 5, 2013


म्‍यानों को तो तलवारें ही मिलेंगी
     तंग दिमागों को तो दीवारें ही मिलेंगी।            
     जब जंग, जेहाद के जमाने हों
     जिधर देखो क़तारें ही मिलेंगी।                  
     जब सब कुछ बिखर जाए रेज़ा-रेज़ा
     उसकी रग-रग में पुकारें ही मिलेंगी।         
     इतना बड़ा हो गया है आजकल
     उसके अग़ल-बग़ल में मीनारें ही मिलेंगी।     
     मेरे लिए हमेशा आंगन में खड़ी रही
     माँ तेरे आंचल में बहारें ही मिलेंगी।         
     लोगों के दुख-दर्द बांटने पर हमेशा
     दिलों में दुआओं की फुहारें ही मिलेंगी।       
     जब ऊंचे शायर लोगों के बीच नहीं जाएंगे
     मंचों से उलटी सीधी हुंकारें ही मिलेंगी।      
     खुद्दारी जिसे जाँ से भी प्‍यारी है
     कहाँ उसके आसपास दीनारें ही मिलेंगी ?    
     बिन िवचारे वोट देने व न देने वालों को
     हमेशा ऐसी वैसी सरकारें ही मिलेंगी।             

3 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!
आपकी यह पोस्ट कल दिनांक 07-01-2013 के चर्चामंच पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

निहार रंजन said...

सुन्दर शेर सारे.
कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें

Naveen Mani Tripathi said...

लोगों के दुख-दर्द बांटने पर हमेशा
दिलों में दुआओं की फुहारें ही मिलेंगी।

pandey ji khoob soorat rachana ke liye sadar abhar.